Sunday, August 2, 2009

मेरी प्यारी नानी

बचपन में जो मेरी माँ के बाद सबसे प्यारी थी मेरे लिए , जिसकी हर बात मिश्री की तरह थी ,जिसकी निगरानी में बचपन के वो हशीन दिन इतने महफूज़ बीते , जिनकी कहानियां सुन-सुन के हम बड़े हुए और जो इतने बड़े परिवार में मातामही थीं ,मेरी नानी पिछले रात इस दुनिया से चल बसी ।

अप्रैल से ही जब नाना जी गुजर गए , नानी की तबियत भी बिगड़ने लगी थी । अभी हाल में ही उनके पैर में एक चोट आई थी जिसके असहनीय दर्द का वर्णन नहीं है । फ़िर अपने सामने में पति के गुजर जाने के बाद वो वैधव्य , तुषार-वृता अपने दिल के दर्द को और सह न सकीं शायद । मेरी नानी अपने में हर एक नानी की तरह आदरणीय थीं ।

मैं अपने नानीहाल में ही पैदा हुआ था और अपने बचपन की मेरी कुछ सबसे प्यारी यादें नानीहाल से जुडी रहेंगी । जब मैंने बचपन में कभी चिट्ठी लिखनी सीखी थी , तो अभी भी याद है की माँ ने कहा था की नानी को चिट्ठी लिखो ... स्कूल जाने को एक साइकिल के लिए ,हलाँकि मेरी साइकिल की ऐसी कोई चाहत नहीं थी, बस नानी को लिखने की उमंग थी।
छुट्टियों में जब ननिहाल गया , बड़े प्यार से नानी ने मुझे चूमा था और कहा था की मेरा नाती खूब पढ़े-लिखे और बड़ा आदमी बने (और जब मैं बड़ा हो गया, तो इस भागम-भाग की जिंदगी में नानी से उतनी ही कम बार मिल पाया ) । नानी मेरे हर छिट्ठी का जवाब लिखती थी और बड़े प्यार से पढने और सेहत का ख्याल रखने को लिखतीं । ननिहाल से कोई ख़त होता था तो मैं सबसे पहले नानी की चिट्ठी पढ़ा करता, फिर अपनी किसी मौसी या मामा की । अभी हाल तक जब मैं 'PG' में था तब तक मैंने नानी को चिट्ठी लिखी , नए साल में हर साल ग्रीटिंग भेजे ।

उनकी बनायीं वो शुद्ध घी के बेसन के लड्डू का स्वाद कैसे भुला सकता हूँ मैं ?
मेरी मछलियों से सारे कांटे वो निकालतीं थीं. मेरे लिए दूध -रोटी की कटोरी लाती और खिलाती .
जो भी फरमाइश करूँ ,जरुर पूरा करवातीं ...
मेरे ननिहाल में मेरी माँ सात बहनों और तीन भाइयो से हैं । वहाँ एक नानी थी जो सबका ख्याल रखती थीं । हम बच्चों की चहेती नानी के कुछ कहानियों की reciordings मेरे पास हैं जिसमे वो अभी भी उतनी ही जीवंत हैं, हमारे उतने ही करीब ।
नाना-नानी के गुजर जाने के बाद, ननिहाल से वो लगाव अब पता नहीं कितना रह पायेगा । ख़ैर चाहे जो भी हो ,
"...मोहल्ले की सबसे निशानी पुरानी , वो बूढीया जिसे बच्चे कहते थे नानी ,
वो नानी की बातों में परियों का डेरा , वो चहरे की झुरिर्यों में सदियों का फेरा ,
भुलाए नही भूल सकता है कोई, वो छोटी सी रातें वो लम्बी कहानी ..."



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