Wednesday, November 2, 2011

मैं तन्हा था मगर इतना नहीं था...

"मैं तन्हा था मगर इतना नहीं था,

तेरे बारे में जब सोचा नहीं था ।

समंदर ने मुझे प्यासा ही रखा ,

मैं जब सेहरा में था प्यासा नहीं था ।

मनाने - रूठने के खेल में हम,

बिछड़ जायेंगे ये सोचा नहीं था ।

सुनोगे तुम की बंद कर ली हैं मैंने आँखे ,

कई रातों से मैं सोया नहीं था । "

[सेहरा: Sehra is parched, lifeless and inanimate yet one of the most enduring tales of love (Laila and Majnu) was played out in its inhospitable sands.

At more spiritual level its monolithic space holds most fascinating conundrums of life.]

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